रविवार, 3 जुलाई 2022

सांप के मुंह में छछूंदर, न खाते बने न उगलते बने , Sanp ke munh me chhachhundar

 

सांप के मुंह में छछूंदर, न खाते बने न उगलते बने

सांप के मुंह में छछूंदर, न खाते बने न उगलते बने , Sanp ke munh me chhachhundar

 

 

एक गृहिणी  सुबह का खाना बनाकर सबको खिला चुकी थी। उसका पति सुबह तड़के खेतों पर चला गया था। दोपहर तक उसे खाना लेकर खेतों पर पहुंचना है। इसलिए उसने उसका भजन बांधकर एक जगह रख दिया था। समय बहुत था। उसने सोचा कि तब तक झाड़ू लगाकर घर की सफाई कर दूं। कई दिनों से चूहों ने भी बहत परेशान करे रखा था। अंदर कमरे की लकड़ियों और धरनों के पटान में चृहों ने बिल बना लिए थे। वहां से पटान की मिटटी नीचे गिराते रहते थे। कमरे के कोनों में बिल बनाकर रहते थे। और तमाम मिट्टी निकालकर कोने में इकटठी कर लेते थे। वह कोने के बर्तन, सामान हटाकर मिट्टी को निकालकर बीच कमरे में लाई। इधर-उधर से और सफाई करके मिट्टी बाहर फेंकने गई।

वह मिट्टी फेंककर आई, तो थोडी देर आंगन में बैठ गई। फिर सोचा, चलो कमरे के कोने में बर्तन लगा आएं। यह सोचकर कमरे में गई। अंदर पहुंचते ही वह घबरा गई और उलटे पांव बाहर दौड़कर आई  जोर-जोर से चिल्लाने लगी, "सांप -सांप !

उसके मकान के सामने एक चौपाल थी। वहां गांव के तमाम लोग बैठे थे। सांप-सांप की आवाज सुनकर सब दौडकर आ गए। एक-दो के हाथों में लाठियां थीं। आस-पड़ोस की औरतें और बच्चे भी अपने-अपने दरवाजे पर खडे होकर झांक रहे थे। चौपाल से गए लोगों ने सबको एक तरफ कर दिया और सावधानी से लाठियां तानकर खड़े हो गए। भीड में से कई तरह की आवाजें आ रही थीं। कोई कहता, "मार देना जान से।'' कोई कहता, मारना मत। किवाडों को बजाकर आवाज करों। अपने आप बाहर निकल आएगा।"

लोगों ने ऐसा ही किया। किवाड़ों पर लाठी से आवाज करने लगे । एकादि मिट्टी के ढेले भी फेंके। थोड़ी देर बाद सांप तेजी से बाहर निकलकर भागा। भागकर चौपाल के पास खड़ी झाड़-फूंस में चला गया। सर्प को भागते समय सबने देखा था कि मुंह में चूहा जैसा कुछ दबाए था। आधा मुंह से बाहर निकला था। लोगों ने सांप को मारने नहीं दिया था। लेकिन कुछ लोग झाड़ के पास भी पहुंच गए थे। लेकिन वहां लोगों ने देखा कि साँप लंबा-लंबा पड़ा था और अब भी मुंह में दबाए  जीव को निगला नहीं था। कोई कह रहा था कि चूहा है। कोई कह रहा था कि सांप के मुह में छछूंदर है।

इतना शोर सुनकर चौपाल से दो-एक बुजुर्ग भी बाहर आ गए। उन्होंने देखा कि कुछ लड़के बहस कर रहे थे कि सांप के मुंह में छछूंदर है। कुछ लड़के कह रहे थे कि चूहा है । एक लड़के ने एक बुजुर्ग से पूछा, "बाबा देखना, वह सांप है। उसके मुंह में चूहा है या छछूंदर है?"

एक बुज़र्ग ने देखा, सांप घबराया-सा झाड़ में लंबा-लंबा पसरा है । उसके मुंह में छछूंदर था। "इसके मुंह में छछूंदर है। " उस बुजुर्ग ने कहा। बुजर्ग की बात सुनते ही दूसरे लड़के ने पूछा, "बाबा, ये सांप छछूंदर को मुंह में क्यों दबाए है। लील क्यों नहीं जाता?"वह बुजुर्ग बोला- ' सांप के मुंह में छछूंदर, न खाते बने न उगलते'। बुजूर्ग की बात सुनकर एक व्यक्ति ने पूछा, "बाबा, ऐसा क्यों है ? न खाता है और न बाहर निकालता है? " बुजुर्ग ने उसे बताया, "देखो बेटा, सांप भूखा है। उसने छछूंदर को चूहा समझकर पकड़ा और निगलना शुरू किया। जब मुंह में आधी छछूंदर चली गई तब उसे पता चला कि यह तो छछूंदर है क्योंकि उसे छछूंदर की तेज बदबू लगने लगी थी। इसलिए अब वह उसे खा नहीं पा रहा है और भूख जोर से लगी है। सांप असमंजस में पडा है। न वह उसे निगल रहा है और न उसे उगल पा रहा है। "

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