खुद गुरूजी बैंगन खाएं, औरन को उपदेश सुनाएं
एक गुरु के कई शिष्य थे। शिष्य गुरु के यहां पढ़ने आया करते थे। गुरु की नगर के बाहर एक बगीची थी। वे अकेले ही थे। बगीची में उनके रहने के लिए एक कुटी थी। उसी में वे भोजन बनाते-खाते थे । बगीची में खुला मैदान था जिसमें वे शिष्यों को पढ़ाया करते थे। मैदान और उनकी कुटिया के चारों ओर क्यारियां थीं। कुछ क्यारियों में मुख्य रूप से गेंदा, कनेर आदि के फूल थे। और क्यारियों में बैंगन, भिंडी, टमाटर आदि के पौधे लगे रहते थे।
उस बगीची की क्यारियों की देखभाल वे स्वयं करते थे। शिष्य जब पढ़ने के लिए आते, तो पढ़ने के बाद वे क्यारियों में घूमते रहते, पौधों को देखते रहते। कभी-कभी पौधों को देखते समय गुरु भी साथ होते। ऐसे समय में शिष्य पौधों के बारे में गुरु से प्रश्न करते। गुरु उनके प्रश्नों का समाधान करते।
गुरु शिष्यों की आदतों को अच्छी तरह जानते थे। इसलिए वे शिष्यों के घूमने के बाद क्यारियों का निरीक्षण करते थे। कहीं पौधों को नुकसान तो नहीं पहुंचाया गया है। बैंगनों का मौसम था। क्यारियों में बैंगन आने शुरू हो गए थे । एक बार शिष्यों के जाने के बाद गुरु ने बगीची का निरीक्षण किया । उन्होंने पाया कि जो चार-पांच बैंगन सब्जी बनाने के लिए तैयार हो गए थे, कोई शिष्य उन्हें तोड़कर ले गया। इस घटना से गुरु कुछ सचेत हुए और सोचने लगे कि इस समय बैंगनों की फसल आई है। बगीची में और कोई सब्जी तैयार नहीं है। कुछ दिन बैंगनों की सब्जी पर ही गुजारा करना पड़ेगा। अब शिष्यों को कैसे समझाएं
कि वे बैंगन तोड़ना छोड़ दें।
गुरु ने शिष्यों को और अधिक मौका नहीं दिया। अगले दिन जब शिष्य पढ़ने आए, तो सबसे पहले गुरु ने बैंगन को लेकर ही कुछ बातें बता डालीं। गुरु ने बताया कि बैंगन की सब्जी मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए बहत हानिकारक है। बैंगन बच्चों और किशोरों को हानि करता है। इसलिए पढ़ने वाले बच्चों को भी बैंगन की सब्जी से बचना चाहिए। इसके बाद गुरु ने शिष्यों को पढ़ाया। उसके बाद शिष्य रोज की तरह क्यारियों में घूमने गए। बाद में गुरु ने क्यारियों का निरीक्षण किया, तो खुश होकर मन-ही-मन कहने लगे कि आई युक्ति काम में । एक भी बैंगन नहीं टूटा था।
अब तो गुरु जी निश्चिंत होकर बैंगन की सब्जी रोज बनाते। शिष्यों ने बैंगनों को तोडना तो बंद कर दिया था लेकिन बैंगनों के न खाने की बात उनके मन में गूंजती रही। एक बार कुछ शिष्य जल्दी पहुंच गए । उस समय गुरु जी अपना भोजन बना रहे थे। सब्जी बन रही थी। वे उनके पास जाकर खड़े हो गए और बतियाने लगे। उसी समय गुरु जी को लघु शंका लगी। गुरु जी ने शिष्यों से कहा, "अभी आया। "और चले गए। शिष्यों ने आपस में खुसुर-पुसुर करना शुरू कर दी। एक ने कहा, "हांडी में देखते हैं। गुरु जी ने क्या बनाया है?" एक शिष्य डर रहा था। उसने कहा,"यह गलत है। रहने दो।" लेकिन और शिष्यों ने उसे चुप करा दिया । एक ने ढक्कन उठाकर देखा-उसमें बैंगन की सब्जी बन रही थी । यह देखकर सब हैरत में रह गए। उनमें से एक ने कहा,"भई वाह, 'खुद गुरूजी बैंगन खाएं, औरन को उपदेश सुनाएं' । "
इतना सुनकर सब शिष्य हँस दिए।
