वो सवारी तो गई
तेज धूप निकली हुई थी। रास्ते पर बढ़िया और एक लड़की चली जा रही थीं। वे अपने घर से सुबह-सुबह निकली थीं। और अब शाम होने को थी। बुढ़िया तो बूढ़ा-पका हाड थी। इसलिए वह अराम से चली जा रही थी। लेकिन उसके साथ की लड़की इतना कभी नहीं चली थी। वह थक चुकी थी।
जहां बुढ़िया को पहुंचना था। वह गांव अब थोड़ी दूर ही रह गया था। फिर भी वह लड़की की हिम्मत बढ़ाते चली जा रही थी। उसी समय पीछ़े से घोड़े की टापों की आवाज सुनाई पड़ी। आवाज पास आते ही बुढ़िया ने मुड़कर देखा। एक घुड़सवार आ रहा था। घुड़सवार के बराबर आते ही बुढ़िया ने उससे पूछा, "बेटा, कहां जा रहे हो?" उस घुड़सवार ने उत्तर दिया, "मैं नगर जा रहा हूं।" बुढिया ने फिर कहा, "बेटा, एक छोटा काम है। उसे तुम कर सकते हो।" घुड़सवार को बात समझ में नहीं आई। फिर भी उसने पूछ लिया, "क्या काम है?" बुढिया ने बताया कि पास के गांव में जाना है। रास्ते में ही पड़ेगा। ये लडकी चल नहीं पा रही है। बहुत थक गई है। बेटा, वहीं तक इसे अपनी घोड़ी पर बैठा ले। इसे जो पहला फलां गांव आएगा, उसी में उतार देना।
घुडसवार ने सोचा कि कहां यह आफत गले पड़ रही है। वह सिर झटकता हुआ आगे बढ़ गया। बुढ़िया चलती रही सोचती रही। हाय राम। आदमी में अब दया नाम की चीज नहीं रही। बोलो, छोटा सा काम नहीं किया घुड़सवार ने। उधर थोड़ी दूर पहुंचकर घुड़सवार के मन में बुरे विचार बनने लगे। सोचने लगा-बुढ़िया के साथ सुंदर लड़की है । उसको बैठा कर ले जाते हैं। बुढ़िया कहां खोजती फिरेगी मुझको। चलो, ऐसा ही करते हैं। यह सोचकर वह घुडसवार वापस हो लिया। बुढ़िया के पास आकर रुका और बोला, "अम्मा, तू कह रही थी कि लड़की थक गई है। इस लड़की को गांव में छोड़ देना। "
घुड़सवार की बात सुनकर बुढ़िया ने अपना सिर ऊपर किया और उसे देखा। उसके चेहरे पर आए भाव बुढ़िया ने पढ़ लिए। उसने घुड़सवार को उत्तर देते हुए कहा, "जा बेटा, तू जा। 'वो सवारी तो गई'।"
