गुरुवार, 2 जून 2022

साझे की हंड़िया चौराहे पर फूटती है Sajhe ki Handiya Chourahe pe

 साझे की हंड़िया चौराहे पर फूटती है

साझे की हंड़िया चौराहे पर फूटती है Sajhe ki Handiya Chourahe pe

 

 

एक नगर में दो मजदूर साथ साथ रहते थे। जब दोनों अपने काम से लौटकर आते, तब शाम हो जाती थी। फिर सामान खरीदकर लाते और अपना अपना खाना बनाते। जब खाना बनाते तो अापस में बतियाते रहते। कभी काम धंधे की बातें करते, तो कभी घर परिवार की बातें और कभी दुनियादारी की बातें करते। पास में मजदूरों की मंडी, बजरिया थी। बजरिया में आस पास के मजदूर इकट्ठे होते थे। वहां से लोग मजदूरों को देहाड़ी पर ले जाते थे । वे दोनों भी किसी-न-किसी के साथ देहाड़ी पर यहीं से जाते थे।

            एक दिन दोनों बैठे बैठे खाना बना रहे थे और बतियाते भी जा रहे थे। एक ने कहा, "भाई, हम दोनों अलग अलग खाना बनाते हैं। दोनों का अलग-अलग समय लगता है। हम लोग भोजन यदि एक साथ बना लिया करें, तो कैसा रहेगा। "दूसरे ने कहा, "बात तो ठीक है । एक समय तुम बना लिया करना। दूसरी बार मैं बना लिया करूंगा। और हम आधे आधे पैसे मिलाकर सामान ले आया करेंगे। ठीक है भैया। कल से ही शुरू कर देते हैं।' इतना कहकर दोनों खाना बनाते रहे। थोड़ी देर बाद खाना खाया और सो गए।

            सुबह त्यौहार था। दोनों बाजार गए और बराबर पैसे मिलाकर वहां से बड़ी हांडी खरीदकर लाए। क्योंकि इनके पास जो हांडी थीं छोटी-छोटी थीं। किसी एक में दोनों का खाना एक बार में नहीं बनाया जा सकता था। इसलिए उनको एक बड़ी हांडी खरीदनी पड़ी। अब दोनों का भोजन उसी हांडी में बनने लगा । वे अधिकतर चावल बनाते थे लेकिन जब वे रोेटियां बनाते थे तो दाल या सब्जी उसी हांडी में बना लेते थे।

इस तरह साझे में खाना बहुत दिनों तक चलता रहा। एक दिन किसी बात को लेकर दोनों में अनबन हो गई । कई दिन ऐसे ही चलता रहा और साझे में बनाया खाना-खाया जाता रहा। एक दिन यह अनबन तनातनी में बदल गई। गाली-गलौज करने लगे और हाथापाई पर उतर आए। और भी मजदूर आस-पास रहते थे। उन्होंने आकर बीच-बचाव किया। दोनों को लोगों ने समझाया लेकिन किसी के भी समझ में नहीं आई। अंत में यह तय किया गया कि साझा काम सब बंद। अब अपना-अपना भोजन बनाकर खाओ।

सुबह हुई तो दोनों ने कहा कि जो साझे का सामान है, उसका बंटवारा कर लो। कुछ चावल भी बचे थे, दोनों ने पहले खाने की सामग्री को आधा-आधा किया। इसके बाद बर्तनों को बांट लिया। अधिकतर दो-दो बर्तन थे । एक-एक बरतन आ गया। अंत में हांडी रह गई।

एक कह रहा था कि हांड़ी मुझे दे दो। इसके बदले में मुझसे कुछ और ले लो। यही बात दूसरा भी कह रहा था। लेकिन कोई भी किसी की बात पर तैयार नहीं हुआ। दोनों में हांडी की छीना-झपटी शुरू हो गई । दोनों एक-एक हाथ से हांडी पकड़े-पकडे हथिया रहे थे। एक हांडी को खींचते हुए दूर तक ले जाता।दूसरा उसके साथ खिंचा चला जाता। क्योंकि उसे डर था कि हांड़ी टूट न जाए। इसी प्रकार जब दूसरा हांड़ी को खींचता तो पहला खिंचा चला जाता।

पास में ही चौराहा था। खींचा-तानी करते-करते वे चौराहे पर जा पहंचे। चारों ओर से तमाम लोग इकट्ठे हो गए। हांडी का यह तमाशा देखकर लोग हंस रहे थे। कुछ लोगों ने आकर समझाया कि कोई एक हांड़ी ले ले। यदि ऐसा नहीं करोगे तो हांड़ी टूट जाएगी और फिर किसी को कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन कोई भी दूसरे को हांड़ी देने को तैयार नहीं था । दोनों ही हांडी को साबुत छीनने की कोशिश करते रहे। इसी उधेडबुन में हांडी किसी तरह हाथों से निकलकर सड़क पर गिर पड़ी । हांडी के कई टुकड़े हो गए।

अब दोनों शांत हो गए थे । लोगों को पता चल गया था कि हांडी साझे के पैसों की खरीदी गई थी । इसलिए एक बुजुर्ग ने कहा, "भैया, 'साझे की हांडी, चौराहे पर फूटती है'

सब लोग ठहाका लगाकर हंसे और वे दोनों वहां से तेजी से खिसक लिए।

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