रविवार, 8 मई 2022

अंधा बांटे रेबड़ी, घूम-घूम अपने को देय Andha bante Revadi Ghum Ghum Apne Ko Dey

 अंधा बांटे रेबड़ी, घूम-घूम अपने को देय


अंधा बांटे रेबड़ी, घूम-घूम अपने को देय




एक गड़रियों का गांव था। ये लोग अधिकतर बकरियां और भेड्े चराने का काम करते थे। उनमें कई लोग ऊंट भी रखते थे। ऊंट से गांव के आस-पास लगने वाले हाटों का सामान लाते, ले जाते थे।

एक दिन एक गड़रिया ऊंट खरीदकर लाया। उसने इस खुशी में लोगों को प्रसाद बांटना चाहा। उसने दो व्यक्तियों को बनिया की दुकान पर भेज दिया। बनिया के यहां उस समय कोई मिठाई तैयार नहीं थी, लेकिन रेबडियां थीं। वे लोग दो सेर रेबड़ियां खरीदकर ले आए। उस समय उंटबरिया के दरवाजे पर सैकड़ों लोग इकट्ठे थे । दोनों ने रेबड़ियों का अंगोछा चबूतरे पर रख दिया।

अब रेबड़ियां बांटने का समय आया तो समझदार और बुजुर्ग व्यक्ति को चुनने के लिए लोग सोचने लगे। वहां बैठे नैनसुख का नाम लिया गया। एक आदमी उठा और नैनसूख को लेकर आया रेबड़ियों का अंगोछा नैनसुख को पकड़ा दिया। नैनसुख ने अंगोछे की झोली बनाकर बाएं कंधे पर टांग ली।

नैनसुख के हाथों में झोली आते ही आवाजें आने लगी थीं । कोई कहता- बाबा मुझे देना रेबड़ी। कोई कहता--ताऊजी, मुझे देना रेबड़ियां । इस प्रकार तरह-तरह की आवाजें आने लगीं भीड में से।

नैनसुख थे तो बड़े होशियार लेकिन थे अंधे,बीच में खड़े थे और चारों ओर से आवाजें सूनाई पड़ रही थीं । वे आंखें फाड़-फाड़कर आवाजें पहचान रहे थे। आवाजें पहचानने में उन्हें महारथ हासिल था। आवाज से ही वे जान लेते थे कि बोलने वाले का नाम क्या है? उन्हें आपने घरवालों की, घर के आस-पास के लोगों की, उनसे रोज बतियाने वालों की आवाजें याद थीं।

एक आवाज आई, "काका मुझे देना।" नैनसूख तुरंत समझ गए कि यह तो आवाज मेरे भतीजे की है । नैनसुख बोले, "कौन, श्यामोला ?" उत्तर मिला, "हां काका। नैनसूख ने 'ले' कहा और रेबड़ियों की एक मुट्ठी उसकी ओर बढ़ा दी। दूसरी आवाज सुनाई दी, "दद्दु, मुझे भी देना।" नैनसुख ने आवाजों की भीड़ में पहचानते हुए पूछा, "कौन, रामलाल?" उत्तर मिला, "हां दद्दु। " नैनसुख ने रेबड़ियों की एक मुट्ठी फिर निकाली और बढ़ा दी उस ओर। रामलाल ने रेबड़ी ले लीं। अबकी बार एक आवाज पीछे से आई, "'मुझे भी देना चाचा। " यह आवाज रामप्यारी की थी। नैनसख तुरंत पीछे घूम गए और बोले, "कौन, रामप्यारी?" उत्तर मिला, "हाँ चाचा।" एक मुट्ठी उस ओर बढ़ाते हुए कहा, "ले|”

नैनसुख रेबडियां बांटते-बांटते चकरधिन्नी हो गए कभी दाएं घूमते, कभी बाएं घुमते। कभी पीछे घूमते। फिर उसी ओर घूम जाते। दूर से देखने वाला यही समझेगा कि भीड़ में कोई घुम-घूमकर नाच रहा है। वह भी पुरुष।

नैनसुख को थोड़ी-थोड़ी झुंझलाहट होने लगी थी। लोग समझ गए थे कि नैनसुख उन्हीं को रेबडियां दे रहे हैं जिनकी वे आवाज पहचानते हैं या जो उनके थे । तो अब जैसे ही वे रेबडियों की मुट्ठी झोली से निकालते, तो दूसरे लोग बीच में ले लेते। और जब नैनसुख किसी की आवाज दोबारा सुनता तो नैनसूख बोल पड़ते, " अभी तो तुझे दी थी । फिर दोबारा मांग रहा है।" नैनसुख की आवाज सुनकर वह व्यक्ति बोलता, "मुझे नहीं मिलीं। वो तो सदाशिव ने ले लीं।

यह तमाशा देखकर कुछ लोग फुसफुसाने लगे कि नैनसुख तो अपने लोगों को ही रेबडियां बांट रहे हैं । तो भीड़ में से एक नैनसुख के बुजुर्ग साथी ने ही कहा, ""भैया, 'अंधा बाटे रेबड़, घूम-घूम अपने को देय'


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