एक से भले दो Ek Se Bhale Do
एक परिवार था। उस परिवार में बढ़ी मां थी और एक उसका लड़का। एक लड़की भी थी जो ससुराल में थी। बूढ़ी मां ज़ीवों से बहुत प्यार करती थी। जब लड़का काम पर जाता था, तो मां अकेली रह जाती थी। उस समय बुढ़िया कुत्ता, तोता और नेवला से मन लगाए रखती थी। उसका लडका भी इनसे बहुत प्यार करता था।
एक दिन लड़के ने अपनी बहन के जाने के लिए कार्यक्रम बनाया। दो दिन का रास्ता था। चलते समय लड़के ने कुत्ते को अपने साथ ले जाना चाहा। उसने सोचा था कि रास्ता ठीक से कट जाएगा। लेकिन उसकी मां ने मना करते हुए कहा कि यह घर की रखवाली करता है। रास्ते में तमाम कुत्ते मिलेंगे। उनसे बचाना मुश्किल हो जाएगा । उसने जब तोता को साथ ले जाने के लिए कहा तो मां ने कहा कि इससे पूरे दिन बातें करती रहती हूं । रास्ते में कोई बिल्ली मार देगी। फिर उसकी मां ने कहा कि इस नेवले को ले जा। तू इसी से अधिक शरारतें करता है।
दूसरे दिन जब वह चला तो नेवले को साथ ले लिया। उसके गले में लंबी पतली रस्सी बांध रखी थी। नेवला दौड़ता हुआ आगे-आगे चला जा रहा था। चलते-चलते रात हो गई। वह गांव के बाहर मंदिर के पास पीपल के पेड़ के नीचे रुक गया। वहीं पास में एक कुआं भी था। खाना खाकर नेवले को खिलाकर धरती पर ही बिस्तर लगाया। नेवले की रस्सी पीपल की जड़ से बांध दी और सो गया। नेवला भी बैठा-बैठा ऊंघता रहा।
रात को वहां एक सर्प आया और उस लड़के को काटने के लिए फुंकारा। सर्प की फूंकार से नेवले की आंख खुल गई। लडके को संकट में देखकर नेवले ने सर्प पर आक्रमण कर दिया। काफी देर तक दोनों लड़ते रहे। नेवला जख्मी हो गया लेकिन उसने सर्प के टुकड़े-टकड़े कर दिए।
लड़का बहुत थका हुआ था इसलिए उसकी नींद नहीं खुली। सुबह जब उठा, तो उसने अपने आस-पास खून देखा। फिर उसकी दृष्टि मरे सर्प के टुकड़ों पर गई। जख्मी नेवला बैठा था। उधर से एक साधू निकला और वहां आकर रुक गया। एक-दो व्यक्ति और आ गए थे। साधु को घटना के समझते देर नहीं लगी। और यह कहते चल दिया- "एक से भले दो"।
