मरने के बाद वैद्य बहुत हो जाते हैं
एक बार रामखिलावन बीमार पड़ा । पहले उसे जुकाम हुआ। उसने ध्यान नहीं दिया। कुछ दिन बाद बुखार आने लगा। जब तेज ब्खार आया, तो वैद्य से दवा ले आया। कुछ बुखार उतरा तो खांसी शुरू हो गई । उसने सोचा कि आठ-दस दिन में अपने-आप खत्म हो जाएगी। लेकिन परेशानी बढ़ गई तो फिर दवा लाने लगा। कभी वह दवा ले आता तो कभी दवा लाना छोड़ देता। कभी कुछ ठीक रहता, कभी हालत बिगड़ जाती। इस प्रकार लगभग दो वर्ष बीत गए। आास-पड़ोस के लोग आकर बैठते और दिलासा देकर चले जाते। जब रिश्तेदारों को खबर चली, तो वे भी आते, एक दिन रुकते और ठीक होने की कामना करते हुए चले जाते।
उसके दो लड़के थे, और दो लड़कियां । लड़के बड़े थे और काम करने जाते थे। लेकिन वे लड़कपन में ही रहते थे। अपनी जिम्मेदारियां नहीं समझते थे। एक ने काम छोड़ दिया था। दूसरा कभी जाता था, कभी नहीं जाता था। वह तो बीमार चल रहा था। पैसों की तंगी बहुत बढ़ गई थी। इसी फिक्र में वह और बीमार रहने लगा।
एक दिन ऐसा आया कि वह बीमारी में बेहोश रहने लगा। उसकी औरत के दिमाग में कुछ भी नहीं सूझ रहा था। कभी वह वैद्यों के पास भागती थी तो कभी झाड- फूंक करने वाले भगतों के पास एक दिन ऐसा अया कि वह इस संसार से चल बसा ।
चारों ओर मातम छा गया था। जो सुनता, उसके घर की ओर चल देता। रोने के करुण स्वर सुनाई पड़ रहे थे। पड़ोसियों ने क्रिया-कर्म का सामान मंगाया। पड़ोसिन औरतों ने उसकी औरत को संभाला । थोड़ी देर में अर्थी तैयार हो गई और लोग उठाकर मरघट को चल दिए । रास्ते में लोग "राम नाम सच है' " कहते जा रहे थे। कुछ लोग उसके बारे में बातें करते जा रहे थे।
अर्थी मरघट पर पहंच गई। साथ में बैलगाड़ी में लकड़ियां भी पहुंच गई थीं। वहां थोड़ी जगह साफ करके लकड़ियों से चिता बनाई जाने लगी। पहले कुछ लकड़ी बिछाई गई और फिर उन पर अर्थी को रखा गया। चिता तैयार होने पर उसके बड़े लड़के ने मुखाग्नि दी। थोड़ी देर में चिता धू-धूकर जलने लगी। कुछ देर बाद लोगों ने उसके लड़के से कपाल क्रिया करवा दी।
इधर बरगद के पेड़ के नीचे बैठे लोग बतिया रहे थे। आठ-आठ दस-दस लोगों के समूह बन गए थे। थीं। सभी समूहों में उसकी ही बातें चल रही । एक आदमी बोला, "मैंने तो उसे बताया था कि उससे दवा ले आ। दो-चार दिन में ठीक हो जायेगा। नहीं गया।" दूसरा व्यक्ति बोला, " भैया होनी बलवान होती है। वैसे तो मुझसे मिलता रहता था। घर के मामलों में मशवरा लेता रहता था। जब अधिक तबीयत खराब हुई तो मुझे पता नहीं चला उसने भी बुलवाया नहीं। मेरे पास तो इस मर्ज की अचूक दवा थी । बहुत से लोग उस दवा से ठीक हुए हैं। " तीसरा व्यक्ति बोला, "अरे भाई, खाना तो नहीं छोड़ना चाहिए । इसीलिए कमजोरी आती चली गई। खाली पेट दवा को झेल नहीं सका।"
इस प्रकार तमाम आदमी अपने-अपने ढंग से अपनी-अपनी बात कह रहे थे। एक बुजुर्ग यह सब बातें सुन रहा था और कहने वालों के ऊपर उसे गुस्सा आ रहा था। उसने तेज स्वर में कहा, "हां भइया, ठीक कह रहे हो। 'मरने के बाद वैद्य बहुत हो जाते हैं'। "
उस बुजुर्ग की बात सुनकर कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
